पूर्ववृत्त:
श्री जयमंगल संस्कृत महाविद्यालय विदवान मनीषी एवं कर्मयोगी श्री जयमंगल दास जी के नाम पर पड़ा जिन्होंने 36 वर्षो तक अन्न त्याग किया था इसलिए इन्हें अन्नछड़ा महाराज भी कहा गया ।
अपने तप त्याग एवं साधना एवं योगविद्या के बल पर इन्होंने कई सामाजिक कार्य किए। तत्कालीन समय में आपकी योग साधना ऐसी थी कि बरसात की बढ़ी नदी पर ये पैदल आ-जा सकते थे। उस समय इनके कई शिष्य रहे, इनको कई योग-सिद्धिया प्राप्त थी, वाणी पर तो ऐसी सिद्धि थी कि जो कह देते थे वही हो जाता था। इन्होने १६ वर्ष की अवस्था गृह त्याग दिया था तथा योग साधना के लिए वाराणसी चले गए। बहुत बीत जाने के बाद इनके अनेक सिद्धियों से प्रभावित हो कर खपरहा के भिछुक नरेश ने इन्हें वाराणसी से वापस गृह जनपद ले आये और यहाँ आकर इनके सम्मान में भव्य-यज्ञ का आयोजन किया, जिसमे इनके अनेक शिष्यों ने गुरुमंत्र तथा दीक्षा ग्रहण की। एक बात जो उन्होंने ही कही थी :-
"नदी नाम सती तीरे बबूरश्चबृहद बनं।"
"पठताम लघुसिद्धांत कौमुदी पंडितः हरिलालच ||"
इस महाविद्यालय के पुस्तकालय में इनकी एक शंख आज भी सुरक्षित रखी है| यह संस्कृत महाविद्यालय तब से लेकर आजतक संस्कृत शिक्षा के रूप में अपनी अलग समस्त क्षेत्र तथा प्रदेश में जगाए हुए है| यह संस्कृत महाविद्यालय यमदग्नि ऋषि की तपोस्थली जौनपुर शहर से २२ किमी दूर एनएच-५६ लखनऊ वाराणसी सड़क मार्ग पर वक्शा थाना ६ किमी आगे ग्रामीण अंचल में अवस्थित है |
यहां आज भी संस्कृत साहित्य, ज्योतिष एवं खगोल, पुरोहित एवं कर्मकांड, नव्याव्याकरण, वेद-वेदांग, योग एवं अध्यात्म तथा अनेक महत्वपूर्ण प्राच्य भारतीय परंपरा में सनहित सांस्कृतिक विरासत के रूप में विधमान अनेक भाषाओं के साथ आधुनिक विषय ज्ञान-विज्ञान कि भी शिक्षा प्रदान की जा रही है |
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